मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

क्या कसूर था इसका???????????

गौर से देखिये इस मासूम बच्ची को.... इसकी उम्र महज नौ साल है. इसका नाम अनुष्का है. ये अब इस दुनिया में नहीं है. यह आपको बहुत आम बात लग रही होगी की अनुष्का अगर दुनिया में नहीं है तो इसमें ख़ास बात क्या है? मैंने इसे अपने ब्लॉग का हिस्सा क्यों बनाया लेकिन अनुष्का की कहानी सुनकर आप भी दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जायेंगे.
अनुष्का का  पिछले  29 अक्टूबर को स्कूल के अन्दर  रेप किया गया वो भी अप्राकृतिक. उसकी हालत देख कर पोस्ट मार्टम करने वाले डॉक्टर भी रो पड़े.
अनुष्का की माँ सोनू  रोज की ही तरह अनुष्का को स्कूल छोड़कर आई और अपनी नौकरी पर चली गयी. दोपहर को अनुष्का और उसकी छोटी बहन दीक्षा साथ में ही लौटते थे. उस दिन स्कूल की छुट्टी दोपहर एक बजे की जगह ग्यारह बजे कर दी गयी. दीक्षा को ये कह कर घर भेज दिया गया की अनुष्का की तबियत ख़राब है और वो अकेली ही घर चली जाये. रिक्शे वाला दीक्ष को घर छोड़ गया. दोपहर बारह बजे अनुष्का की माँ को फोन करके उसे ले जाने को कहा गया. जब अनुष्का की माँ स्कूल पहुची तो अनुष्का को घर भेज देने की बात कही गयी. घर आने पर मोहल्ले वालों ने बताया की अनुष्का को स्कूल की आया और दो आदमी घर के बहार फेक गए थे. वो बेहोश थी इसलिए मोहल्ले के कुछ लोग उसे लेकर हॉस्पिटल गए है. इधर अनुष्का की माँ हॉस्पिटल पहुची. उस दिन IMA की strike के चलते किसी हॉस्पिटल ने उसे admit नहीं किया. उसकी माँ doctors के आगे हाँथ जोडती रही पर किसी को तरस नहीं आया. जब तक वो सरकारी हॉस्पिटल पहुचती उसकी death हो चुकी थी. hallet हॉस्पिटल से उसे brought dead बताकर वापस कर दिया गया. किसी को नहीं पता था की अनुष्का की मौत कैसे हुई. अनुष्का के माँ खुद को संभाल नहीं पा रही थी. मोहल्ले वाले दिलासा देने घर आये. अनुष्का दी छोटी बहन ने खेल खेल में जब उसका बैग खोला तो उसमे खून से सने हुए अनुष्का के कपडे भरे थे. उसकी माँ की नजर पड़ी तो वो भाग कर गयी उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. उसने चादर में लिपटी  अनुष्का को खोला तो दांग रह गयी. वो खून से लतपथ थी. उसका रेप हुआ था. रेप  के बाद उसकी ब्लीडिंग रोकने के लिए कपडा ठूस, टेप लगा दिया गया था. पोस्ट मार्टम में अनुष्का के साथ अप्राकृतिक रेप क़ि पुष्टि हुई. उसका शरीर के अंग दांतों से चबाये गए थे. पुलिस कंप्लेंट हुई. अब investigation चल रहा है. स्कूल प्रबंधन पुलिस क़ि गिरफ्त में है. लेकिन अभी तक कुछ प्रूफ न हो पाने के कारण पुलिस अपने को असहाय बता रही है. अब अनुष्का क़ि माँ छोटी बेटी दीक्षा को न तो पढ़ना चाहती है और न ही उसे घर के बहार निकलने देना चाहती है.............. क्या अनुष्का के साथ दरिंदगी करने वाले को सजा मिलेगी?????????????

अनुष्का क़ि माँ.....

रविवार, 26 सितंबर 2010

हर निगाह करती थी मेरा रेप...


उस दरिन्दे ने तो मेरा एक बार रेप किया लेकिन अब  समाज की हर नजर मेरा रेप करती है.  मै एक जिन्दा लाश बन चुकी हूँ. अगर ये लाश भी आप लोगो को अखर रही हो तो बता दीजिये में इसे भी कही बहा दूँ.

ये शब्द शायद आपको कुछ अटपटे लगे,  मुझे भी लगे थे लेकिन उसके साथ जो हुआ उसके आगे ये शब्द बहोत छोटे है.
हम रेप की ख़बरें हमेशा अखबारों में पढ़ते है. मै भी कई बार इस तरह की घटनाओ के बारे में लिख चुकी हूँ. रेप की खबरें छपती है और दो चार दिनों में लोग भूल जाते है. न तो लोगो को और न ही रिपोटर,  किसी को एक बार ख्याल नहीं आता की वो लड़की आज किस हाल में होगी जो कभी रेप का शिकार होने के बाद न्यूज़ पेपर्स की सुर्खियाँ रही है. यही सोचकर मै तीन साल पहले रेप का शिकार हुई लड़की से मिलने का मन बनाया. मै तीन साल पीछे गई.

मुझे  याद है वो दिन. एक महिला संगठन के साथ वो लड़की आई थी. महिला थाने में. उसके पूरे शारीर पर गहरे घाव थे. उसका शारीर उसके साथ हुई हैवानियत साफ़ बयां कर रहा था. मैंने जब उससे पुछा तो कपकपाती आवाज से उसने जो बताया सच में रूह कंपा देने वाला था. उसने इंटर पास किया था और वो आगे की पढाई नौकरी के साथ करना चाहती थी. क्योकि उसके पापा का मानसिक संतुलन ठीक नहीं था और मम्मी में घरो में काम करके उसे पढाया था. एक पेपर में add  देखकर वो रावतपुर के रेव थ्री में interview देने पहुची. लेट होने के कारन उसका interview नहीं हो सका. उसकी आँखों में आंसू आ गए. पास खड़े एक लड़के ने उससे रोने का कारण  पूछा  उसने उसे सच बता दिया. उस लड़ने ने उसे वन विभाग में नौकरी दिलाने का झांसा दिया और से टेम्पो में लेकर वहां से निकला. दुनिया के छल से अनजान वो उसके साथ चल दी. रस्ते में उसकी इच्छाए उड़ान भर रही थी उसने तो यहाँ तक सोच लिया की अब वो अपनी माँ को घरो में काम भी नहीं करने देगी. शाम होने के कारण अँधेरा हो रहा था. वो लड़का उसे गुरुदेव के पास वन विभाग के जंगल में ले गया. वहां उसने उसके दुपट्टे से उसके हाँथ बांध दिए और अपनी रुमाल उसके मुह में ठूंस दी. उसके शारीर को किसी जानवरों की तहर दांतों से काटा. उसका रेप करने के बाद पास पड़े लोहे के तारों से उसका गला कास दिया और वहां से भाग निकला. शायद इश्वर को कुछ और ही मंजूर था इतने के बाद भी वो जिन्दा बच गयी. रात भर वो वही तड़पती रही सुबह जब होश आया तो सँभालने वाला कोई नहीं था. किसी तरह वो वहां से घिसटती हुई सड़क तक आई. एक टेम्पो वाले को उसपर दया आई और वो उसे घर तक छोड़ गया. उसकी माँ पुलिस के पास गयी पुलिस वालो ने उसका मजाक बनाकर उसे वहां से भगा दिया. तब एक महिला संगठन की मदद से मामला दर्ज हुआ. रेव थ्री विडिओ फुटेज से उसने उस दरिन्दे को पहचाना. पुलिस ने उसे पकड़ लिया.
आज तीन साल से मुकदमा चल रहा है. वो मुस्कुराता चेहरा मुरझा गया है. किसी से मिलना, बात करना और मुस्कुराना तो दूर की बात है, उसकी दुनिया उसका छोटा सा कमरा है. उसने खुद को कमरे में उस रेप की घटना के कारण नहीं बल्कि इस समाज के कारण कैद किया है. वो कहती है की उस दरिन्दे ने मेरा रेप तो एक बार किया लेकिन उसके बाद समाज की हर नजर जो उसे देखती उसका बार बार रेप करती लोग उसे इस तरह देखते जैसे उसने खुद कोई गुनाह किया हो. वो आज खुद को एक जिन्दा लाश मान चुकी है. वो किसी से नहीं मिलना चाहती.  वो कहती है की वो सिर्फ उस दिन का इन्तजार कर रही है जब उसके गुनाहगार को फांसी की सजा दी जाएगी.

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

रक्षा बंधन पर अपने भाई की कलाई पर राखी बंधती चली आ रही श्रृष्टि और मुस्कान के हांथो में इस बार राखी नहीं बल्कि बूट पोलिश है. जिसके सहारे वो अपने बही की जिंदगी बचने निकल पड़ी है. उन्हें खुद नहीं पता की वो अप्लास्टिक एनेमिया से पीड़ित भाई के लिए कुछ कर पाएंगी या नहीं लेकिन उनकी जंग जरी है. इस रक्षा बंधन पर वो अपने भाई को राखी के त्यौहार पर उसे नई जिंदगी देना चाहती है.
मुस्कान की उम्र महज दस साल है और श्रृष्टि की उनर बारह साल की है. उनके पिता मनीष बहल एक मोटर मेकेनिक है. उनके पास इतने रुपए नहीं है की वो अपने चौदह साल के बेटे अनुज का इलाज करवा सके. दोनों बहने स्कूल से आने के बात बैग रखती है और हाथो में बूट पोलिश लेकर निकल पड़ती है. शाम को  कानपूर की गलियों में इन्हें किसी के जूतों में पोलिश करते देखा जा सकता है.
मैंने जब इन बहनों को लोगो के आगे बिलखते देखा तो मई भी अपने आंसू नहीं रोक पाई. मैंने इनकी फोटो खींची और अपने पेपर में इनकी खबर पब्लिश की. इन्हें देखकर कई लोग सहानभूति दिखने आये लेकिन मदद को कुछ एक लोग ही आगे आये. जिन्दगी में मुझे पहली बार महसूस हुआ की भगवन ने मुझे ढेर सारा रुपया क्यों नहीं दिया?

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

खतरें में विदेशी मेहमान


ये वो विदेशी मेहमान है वो दूर देश से खाने की तलाश में उत्तर भारत में आते है. हजारो मील लम्बी दूरी तय करके ये तीन से चार महीने उत्तर बहरत में बिताते है. सालो से यूही आ रहे ये विदेशी मेहमान अब सुरक्षित नहीं.
कानपुर के पास नवाबगंज और एलेंफोरेस्ट जू में आने वाले इन मेहमानों पर शिकारियों की नजर है. फोरेस्ट डिपार्टमेंट की अनदेखी से ये बेचारे बेजुबान पक्षी बेमौत मरे जा रहे है. साइबेरिया व मिडिल ईस्ट एशिया में ठण्ड के दिनों में भरी स्नो फाल से इन्हें वहां खाना नहीं मिलता जिक्ति तलाश में ये यहाँ आते है. कानपुर के पास इटावा में इनका शिकार हो रहा है. यही हाल कानपुर का भी है. इन विदेशी मेहमानों की न तो फोरेस्ट डिपार्टमेंट कोई गिनती करता है और न ही कोई सुरखा के इंतजाम. एक तरफ तो पर्यावरण बचने का डंका पीता जाता है वही दूसरी तरफ लाखो की संख्या में आने वाली ये बिर्ड्स असुरक्षित है.

सोमवार, 18 जनवरी 2010



गंगा मैया की सफाई के लिए प्रदेश सरकार ने जन जागरण की शुरुआत कानपुर में सत्रह जनवरी से की। कानपुर में हुए एक भव्य समारोह में नगर विकास मंत्री नकुल दुबे सामिल हुए। लोगो को नजीर पेश कने के लिए उन्होंने गंगा जी में मछलिया छोड़ी। शायद वो इस ख़ुशी में भूल गए की वो क्या कर गए। उन्होंने मछलियों के साथ पोलिथीन भी गंगा मैया में बहा दी। इस दौरान किसी की भी हिम्मत नहीं हुई की मंत्री जी को रोक सकता जबकि शहर का सारा अद्मिनिस्त्रतिओन मजूद था.

आम आदमी, ख़ास आदमी






भारतीय लोकतंत्र जिसके बड़े बड़े kaside  gadre  जाते है। पूरे विश्व में दावा किया जाता है की यह लोकतंत्र हमारी सुरक्षा के लिए है। लेकिन इस लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करने वालो का चेहरा इतना घिनौना हो सकता है। जी हाँ दो जनवरी को कानपुर के पास कापली में हुए ट्रेन हादसे में एक ऐसा ही राजनीती का गन्दा चेहरा सामने आया। प्रयाग राज व गोरखधाम एक्सप्रेस में हुई इस टक्कर में तेरह लोगो की मौत हुई और पचास लोग घायल हुए। इसी प्रयाग राज एक्सप्रेस में भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी भी बैठे थे। घटना की जानकारी होते ही आनन् फानन में उन्हें ट्रेन से उतारकर चंद कदमो की दूरी पर स्थित एक इंजीनियरिंग कॉलेज में ले जाया गया। उन्होंने घटना स्थल तक जाना भी मुनासिब नहीं समझा। इंजीनियरिंग कॉलेज में उनके नाश्ते के इंतजाम थे। जहाँ एक और चीखें गूँज रही थी वाही नेता जी हंसी के ठहाके लगा रहे थे। आस पास गाँव के लोग तो मदद को आये लेकिन अपने लाबो लश्कर के साथ नेता जी सुरक्षी बैठे रहे। नाश्ते के बाद उन्होंने पूरे कॉलेज का निरिक्षण किया और कॉलेज की एक बिल्डिंग का लोकार्पण भी किया। उन्होंने कॉलेज में लगभग एक घंटा बिताया पर लोगो की चीक पुकार उनके कानो तक नहीं पहुची.

बुधवार, 13 जनवरी 2010


नमस्कार, मैं आपकी शशी अब आपके बीच अपने ब्लॉग के जरिये अपनी बातें पहुचाने की कोशिश करूंगी। वैसे मैं एक पत्रकार हूँ, लेकिन आज के माहोल में कलम खुद आजाद नही रह गयी है, जो आपनी सारी
बातें मैं अखबार में लिख सकू, इसीलिये मैंने अपने ब्लॉग को आपने विचारों को आप तक पहुचाने का जरिया बनाया है,